जाट सम्राट चकवा बैन बैनीवाल | रावण भी जिससे डर कर भाग गया था

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बैनीवाल/बैन/वैन – यह एक जाट गोत्र है।

प्लीनी (Pliny) मे इस वंश को बैनेवाल लिखा है जो आजकल बैनीवाल नाम से कहा जाता है। इस वंश के जाट बहुत प्राचीन समय से हैं जिनको मध्य एशिया में वैन या बैन नाम से पुकारा जाता था। ‘मध्य एशिया के प्राचीन इतिहास’ में इनका नाम बारम्बार लिखा गया है जिसके लिए और हवाले देने की आवश्यकता नहीं है।

इस वंश के विषय में हरयाणा की एक ऐतिहासिक कथा निम्न प्रकार से है –

सोनीपत के निकट गन्नौर की ओर जी० टी० रोड से लगभग 20 मील दूरी पर एक स्थान है जिसका नाम मीना माजरा है। यहां पर प्राचीन नष्ट खण्डहर हैं जिनमें कई-कई मंजिलों के मकान हैं जो कि सब भूमि सतह से बिल्कुल नीचे हैं। बहुत समय पहले से इन खण्डहरों के निकट के गांवों के लोग, पक्की ईंटें निकाल रहे हैं। ये ईंटें लगभग 16 इंच लम्बी, 8 इंच चौड़ी और 2 इंच मोटी हैं।

गांवों के लोगों ने रस्सों की सहायता से 30 फुट के गहराई तक दीवारों की ईंटें निकाल ली हैं। इस काम में कुछ मनुष्य मर भी चुके हैं। इस स्थान के निकट प्राचीन मठ और एक बड़ा तालाब है जो हजारों एकड़ भूमि पर है। वहां पर प्राचीन मूर्तियां मिली हैं। इस प्राचीन नगर के विषय में लोग बताते हैं कि यह चकवाबैन की राजधानी थी।

इस राजा का एक महात्मा चुन्कुट ऋषि से मतभेद हो गया, तो चकवाबैन राजा ने उसको अपने साम्राज्य की सीमाओं से बाहर जाने का आदेश दे दिया। कई वर्षों के पश्चात् वह महात्मा इस राजधानी में वापिस लौट आया और राजा को बताया कि “मैं उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम दिशाओं में पहाड़ों एवं समुद्रों तक गया, लोगों ने मुझे प्रत्येक स्थान को सम्राट् चकवाबैन के साम्राज्य का भाग बताया। अतः मैं आपके साम्राज्य से बाहर जाने के लिए असमर्थ रहा।”

इन सब बातों से ज्ञात होता है कि यह स्थान प्राचीन है और यह नगर जरूर राजधानी या एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। इस चकवाबैन के विषय में इतिहास में नहीं लिखा गया है तो भी राजा बैन चक्रवर्ती के नाम पर केसारिया (Kesariya) के निकट एक स्तूप है जिसको ह्यूनत्सांग ने चक्रवर्ती सम्राटों की यादगार लिखा है।

(V.A. Smith, Journal of Royal Asiatic Society, 1952, P. 271)। कारल्लेयल (Carlleyle) ने भी बैराट (Bairat) (जयपुर) से इसी तरह की परम्परागत कथा का वर्णन किया है और वहां भी चकवाबैन का नाम है। (Archaeological Survey of India, Vol. VI, P. 84)।

बिहार में स्तूप बनाने वाले चक्रवर्ती बैन और ऊपर बताई हुई पौराणिक कथा वाला चकवाबैन, दोनों एक ही होने का पता खुदाई कार्य से ही लग सकता है। कनिंघम ने बिहार, अवध और रुहेलखण्ड में चक्रवर्ती बैन के होने का, इसी प्रकार की पौराणिक कथा का उल्लेख किया है (op. cit)। यह सम्राट् बैन या बैनीवाल गोत्र का जाट था। (जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज, पृ० 247-248, लेखक बी० एस० दहिया)।

स्वांगी एवं जोगी भी राजा चकवाबैन, उसका पुत्र राजा महीपाल तथा उसका पुत्र क्षत्रिय राजा सुलतान एवं उसकी रानी निहालदे के गाने प्राचीनकाल से आज तक भी गाते हैं। इनके साम्राज्य की सीमा तथा समय की ठीक जानकारी नहीं मिलती, फिर भी इनके गानों के आधार पर कुछ जानकारी मिलती है जो कि संक्षिप्त में निम्न प्रकार से है –

सम्राट् चकवाबैन का पौत्र और राजा महीपाल का पुत्र राजा सुलतान का विवाह पंजाब के राजा मघ की सुन्दर राजकुमारी निहालदे से हुआ था। जानी चोर राजा सुलतान का मित्र था। एक बार ये दोनों एक नदी के किनारे ठहरे हुए थे। इनको वहां पानी में बहती हुई लकड़ी की तख्ती मिली,

जिस पर लिखा था कि “मैं पंजाब के एक राजा रत्नसिंह की राजकुमारी महकदे हूं। मेरे पिता के मरने के पश्चात् अदलीखान पठान मुझे बलपूर्वक उठा लाया और अदलीपुर नगर में अपने महल में मुझे बन्दी बनाकर रख रहा है। कुछ दिनों में मेरे को अपनी बेगम बना लेगा तथा मेरा धर्म बिगाड़ेगा। यदि कोई वीर क्षत्रिय है तो मेरा धर्म बचाओ।”

राजकुमारी महकदे के लिख को पढ़कर राजा सुलतान ने जानी चोर को उसे छुड़ा लाने का आदेश दिया। जानी चोर नदी पार करके अदलीपुर नगर गया। वहां पर बड़ी चतुराई एवं छलबाजी से अदलीखान पठान के महल से महकदे को निकाल लाया तथा उसके धर्म की रक्षा की।

राजा सुलतान ने महकदे को उसके पिता के घर पहुंचा दिया। इससे अनुमान लगता है कि अदलीखान सिन्ध नदी के पश्चिमी क्षेत्र का शासक था। महाराजा चकवाबैन का समय सम्राट् हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् का हो सकता है। यह एक खोज का विषय है जिसके लिए बड़े परिश्रम एवं धनराशि और सरकार के सहयोग की आवश्यकता है।

यद्यपि इतिहास पुस्तकों में उपर्युक्त सम्राटों का उल्लेख नहीं किया गया, किन्तु निस्संदेह इन सम्राटों का शासन रहा। बैनीवाल/बैन जाटों का शासन जांगल प्रदेश (बीकानेर) में 150 गांवों पर था। इनका युद्ध बीका राठौर से हुआ जिसने इनको हराकर इनके राज्य पर अधिकार कर लिया।

इन बैनीवाल/बैन जाटों की आबादी राजस्थान, पंजाब, हरयाणा तथा उत्तरप्रदेश में पाई जाती है।

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